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Monday, 26 June 2023

कहानी: कैसे

कहानी: कैसे 

__रामेश्वर द्विवेदी 

जीत नाम था उसका। पिता पंजाबी के प्राध्यापक रहे थे। शुचिता उसे विरासत में मिली थी। अब याद नहीं कि उसने पूरे नाम में 'जी' के पहले 'सर्व' या 'दल' या 'दिल' था परंतु मुझे उसका व्यक्तित्व पूरा, पर नाम आधा ही पसंद था । जब फोन मे पहली बार मे मैंने उसे जीत पुकारा वह चौंक गया था -

"सर जी ! मेरे पाजी से बात हुई क्या ? नंबर दिया था न मैंने, वे मुझे जीत ही बुलाते हैं। "

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Thursday, 4 June 2015

- हिरना, समझ बूझि वन चरना -

घने काले बादल, दिन भर एक साँवला अंधेरा, धुंध, वर्शा में धुलते हरे पहाड़। दक्षिणी हवा और घनघोर कोहरे में थमी-धुंधलाती बरैल पहाडि़यों में जातिंग जनजातियों का एक छोटा-सा गाँव-जातिंगा। जाने कितनी सदी पुराना, जंगल में जमा हुआ जीवन, वैसाखी पर टिका हुआ समय, सदी जैसे पाँव कटा कर बैठी थी।
दक्षिण-पष्चिम की बरैल पहाडि़यों से घिरा हुआ गाँव, एक गलियारे में बदल गया था। जैसे एक मोटे-लम्बे पाइप से गुजर कर उस गाँव में जाना होता था। इसी गलियारे से बादल और धुन्द इस गाँव मे प्रवेष करते, दिन को रात बना जाते थे। यहाँ हर वर्श होती प्राकृतिक दुर्घटना को देखने के लिए राजन पिल्लै जब उमसाव से निकला, झमाझम मेघ बरस रहा था। सात-आठ बुलेट एज-डी. पर सोलह-अठ्ठारह लोग, न जाने कितनी नदियाँ अंगडाती-उछलती दौड़ रहीं थीं। गाडि़याँ गुजरती, उड़ते पानी के घने छींटों में, षीषों के महीन चूर्ण से बने सैकड़ों झरनों के उमगने का दृष्य उभर आता।

एक और किस्त जिन्दगी




जेठ की लहास भरी रातए तेज पछिया से उडी़ धूल और दुर्गन्ध से झंकोरी जाती रही। प्रेमदा ने रात की तमाम बेचैन गंधए दादी.सास की पुरानी पलंग परए करवट बदल कर वर्दास्त किया था। यूं तो असंख्य उलझनें उसकी नींद में छाता की कमानी.सी तनी ही रहती थीए तिस पर जेठ द्वारा उसका खेत हड़प लेने का लोभए आज उसे भीतर तक कँपा गया था। सच ही तो कहते हैं लोगए दुश्टों की नीति . पट्टिदार और अरहर की दाल जितना गले अच्छाए नहीं तो जेठ के इस तरह तंग करने का कोई कारण नहीं बनता। वह भी तबए जब पति की मृत्यु के घाव पर अभी पपड़ी भी न पड़ी है।

“ बंद दरवाजों पर दस्तक

“ - की कविताओं के बारे में कुछ नहीं, क्योंकि जो कहना था वह अपने समय के बेहतर षिल्प में 1984 से 2000 तक लिखी गई, इन कुछ कविताओं के रूप में भी सामने है। मगर कुछ वैसे लोगो का ऋृण स्वीकार करना अनिवार्य है, जिन्होंने अनाम-गोत्र युवतर कविता को अप्रत्याषित स्थान देकर प्रकाषित किया, और मेरे आत्मविष्वास को बढ़ाया। पहली कविता सप्ताहिक हिन्दुस्तान ने छापी। इसके उत्प्रेरक थे - कुमार उत्तम, जिनकी आस्था ने कविता में मेरा प्रकाषन प्रारंभ कराया। आचार्य जानकी बल्लभ षास्त्री ने इन कविताओं को देखकर 1991 में लिखा - “ रामेष्वर द्विवेदी नए संभावनाषील कवियों में बहुचर्चित और लोकप्रिय कवि हैं। उनकी भाशा में जो ओज और ताजगी है वह उनकी प्राणवत्ता और आन्तरिक उर्जा की ही प्रतिच्छवि है। जीवन को गहराइयों में उतर कर विविध कोणों से देखने वाली   दृश्टि है उनके पास जिस कारण उनकी सृश्टि में अनायास का सहज प्रवाह है। 

दादी की कहानी में -केतकी-




            गर्मी की छुट्टी की घोषणा के बाद पवन सिन्हा के परिवार के लिए वह एक हड़बड़ायी रात थी। बेटी वर्चश्वी के पाँव ने पारा पहन लिया था। गांव, घर जाना है। पके आम की महक चैत-बैशाख की चाँदनी में फूले अरहर और बची ईख के खेतों से बोलते सियार की आवाज-महानगरीय जीवन के एकदम उलट सबकुछ। न कहीं संगमरमर का शहर-मौजैक किए-कराए मन-न एक खास कटाव-तराश में ढला-आदमी । उन्मुक्त हँसी और पारदर्शी व्यवहार। गाँव का जीवन एक रसता तोड़ता है। हरी सब्जियाँ, गुड गन्ने का रस, पके आम, दूध, दही न जाने कितनी चीजों के साथ लोग मिलने आते हैं। उसकी मम्मी भी सस्ते स्वेटर कम्बल, कपड़े और ऐसी कितनी चीजें लेकर जाती है। -ताली आखिर दोनों हाथ से ही तो बजती है। इसी आपसी लेन-देन का नाम तो है दुनियादारी। आज उसे नींद न आएगी -टेªन की सीटी से पूरी रात गूंजती रहेगी। शैलाभ शिथिल हो गया था। कहाँ से आएगा टेलीविजन? कहाँ खेलेगा वह वीडियों गेम? कैसे देख सकेगा मैच और क्या होगा। दोस्तों के साथ उसकी मटरगश्ती का? सो वह चुप और उदास।

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बेंजामिन मोलाइस के लिए




बन्धु !
तुम्हारा जन्म सार्थक
समय की बहती नदी में
द्वीप-सी उभरी तारीख
तुम्हारी पहचान।
बर्बरता के नकार का नाम
बेंजामिन।
जुल्म के सीने पर
संघर्श-मूल्यों के निषान का नाम
बेंजामिन।

बंजर सदी के अंत में




जब सिनेमा से चालित हो समाज
टी.वी. से चिपके हों
चेहरे और आँख
चकोड़ा चैनलों से उतरकर
हर घर-आंगन में पसर रहे हों
खूबसूरत खतरे
जब पुराने हो गए हो
संस्कार और षास्त्र
रद्दी की जगह जला लिए गए हो
षील और सिद्धांत  

बच्चा





बच्चों !
तुम नहीं हो सिर्फ पुत्र-पुत्री
पौत्र-भाई-बहन जैसा एक रिष्ता 
किसी व्यक्ति के लिए
एक सपना हो तुम
माँ की ऑखों में
कच्चे दूध की हर घूंट के साथ 
समाज के लिए आकार लेते हुए
सार्थक सपना हो
तुम मुस्कुराते हो तो
दस्तक देता है बसंत  

आकाष हमें भी चढ़ना है



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आकाष हमें भी चढ़ना है



सिर्फ पढ़े हैं
चांदनी की सफेद चादर पर
कुमकुम के कुंआरे गीत
दूर क्षितिज की ओर
रूपहले पनघट पर
पनिहारिनों की धुंधली परछाइयां
मेंहदी के जंगल में
पायल की रुनझुन
इंन्द्रधनुश का गुनगुन स्वर
गंधित पुरवाई में
मौंसम का गाया कोई फागुनी राग

मगर कभी भी
” न बोलते हुए फूलों को सुना है  
न झमकती हुई ध्वनियों को देखा है ”
देखे हैं गहरी धंसी हुई
कांच की गोलियों-सी
बाइस बर्शीय आँखे
बेइमानो से काट ली जाने वाली
अधपकी फसलें
बारह बर्शीय बुजूर्गों का
पसीनें में महकता व्यापार
या फूलती साँस के सामान्य होने पर
याद आने वाला प्यार

आस्था



पौेधे पत्थर हो जाऐंगे
सूरज को भी आने लगेगी नींद
जात बदल जाएगी मेंहदी की
गुलाब में बच जाऐगे सिर्फ काँटे
भाग कर छिप जाऐगे लोग घरों में
जब भी कोई अजनबी
किसी चौक पर अकबका कर पूछेगा
खोया हुआ किसी का पता
दोस्त !

-----continues

Monday, 3 October 2011

बेटियॉँ

मेरी कटोरी भैया की कटोरी से छोटी क्यों ?
सब मुझसे ही क्यों छिपाते है सारी चीजें क्यों कहते है पराया धन.
मैं भी चाँद पर जाऊँगी,
तुम्हे कल्पना चावला-सा बन कर दिखाउंगी.
मै  क्यों नहीं चुन सकती अपना फ्रोक
मै भी बांधूंगी फूलो का मफलर
लोहे का दस्ताना पहनूंगी
चौपेत के धार दूँगी चेहरा
जो  कोई देखेगा टेढ़ी नजर.
क्या बुराई है जींस में
कौन बचाएगा मुझे जो कभी
बस कि भीड़ में गर्दन में फँस जाएगा दुपट्टा
पाँव में जितने बंधोगे बेडियाँ
मन में उतने ही उगेंगे पंख
सब बकवास करते है
कि बस बेटों से निहाल होने की बात करते है.

Story collection


बालिकाएँ

बालिकाएँ चप्पल नहीं पहनती स्कूल जाते समय जैसे सब्जी नहीं खोजती, कभी खाते समय सुनती है चुप-चोरी कहानियाँ गावँ कि देवी जी को बतियाते और बोती है है घर-घर, जैसे अकावन सेमल, बंगा के बीज. बोती है हवाएँ
रूई कि तरह उड़ती है. जंगलो में भी वस्ती बनाती है. और सीखती है लिखना ताकि हर हाल में लिख सके ' हाल अच्छा है.'