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Thursday, 4 June 2015

बच्चा





बच्चों !
तुम नहीं हो सिर्फ पुत्र-पुत्री
पौत्र-भाई-बहन जैसा एक रिष्ता 
किसी व्यक्ति के लिए
एक सपना हो तुम
माँ की ऑखों में
कच्चे दूध की हर घूंट के साथ 
समाज के लिए आकार लेते हुए
सार्थक सपना हो
तुम मुस्कुराते हो तो
दस्तक देता है बसंत  

आयेगी कविता



कविता नही आती महीनों
तो मतलब नहीं कि
लापरवाह हो रहे है सपनें
मतलब यह कि आकाष
खाली है परिन्दों से इन दिनों।

कविता आयेगी, - जब उजड़ जाने पर
ढ़ीठ होकर चिडि़याँ
घर के किसी साफ-षफ्फाक कोने में
फिर बनायेगी घोंसला

जब कोई मरेगा कहीं
षब्दहीन अकेले


---Continue

Saturday, 11 February 2012

एक परिचयः मेरे बाद (पंडित श्री योगेन्द्र द्विवेदी) (1923 - 28 फरबरी, 2011))

भूमि पर मुझको लिटाना
जब कभी तो इस तरह कि
पीठ पर आकाश……..
मेरे होंठ मिट्टी से जुडे हों
लोग पूछें तो बता देना
सिर्फ देना जानता था
बसेगी वहीं मूर्ति इस जमीन में
हाथ दो पारस थे जिसके
मिट्टी को कंचन बनाना चाहता था
जन्म से ही धर्म जीता था मनुज का
लोग पूछें तो बता देना
किसी से कुछ माँगा
लोग पूछें तो बता देना यहाँ पर
नींद में घायल सिपाही सो गया है
जो उडाने का बडा शौकीन था उजले कबूतर
और झडता था महज आशीष मंगल
लौह तलहथियाँ से जिनके
सदानीरा नदी कोई बह रही थी
नाडियों में स्वयं के भीतर नसों में
नाचती थी वर्ष नब्बे तक
कुछ पसीने कुछ क्षमा
कुछ अनसुनेपन की नदी
के साथ बहता था नशा बस जिन्दगी का
राग छलछल नेह छलछल
छोह और निर्मोह छलछल
अब नहीं है वह नदी
सरस्वती कोई हुई है फिर अलोपित
या समंदर हो गई है बूंद कोई
अब बसा है एक भोला सा
वही विज्ञानी यहाँ पर जिंदगी का
वाड्ग्मय संस्कृत का पीआ था जिसने
लोग आगत जानने आते रहे थे पास
साख ना तोडी कभी ना झूठ बोला
कबीरा चादर का कभी ना साथ छोडा
ऐसे कई असंभव साधता था जिन्दगी भर 
चाँद छूने की कला भायी जिसको
एक सहारा रेत में बरगद खडा था
चुप अकेला पँक्षियों की ओढकर चादर हरा था
हर महीना वह भरा था
इक घडे सा अर्घ्य था
अभिषेक का जीवन सफर में
रामनामी को पिरो रूद्राक्ष में
पदरज उढाए मुठ्ठियों में
पत्थरों में प्राण का जादू जगाना चाहता था।
हर उपेक्षित आदमी का वह सगा था
लडकियों कि जिंदगी सजती जहाँ थी
उस जमीं पर वह अकेला ही सभा था उम्र भर
आगन्तुकों को बाटताँ था थाल अपनी
हो गया आकाश निस्सीम आयतन है
बस कोई बहती नदी थी
जिसने गोमुख को देखा
पहचाना पूर्वज पर्वतों को
सारे गोमुख गंगा पर्वतों को
है हमारा नमन शत् शत्
नमन शत् शत्
अनथकी इस नदी के राग को
गा रही है कई घरों में आग
उस आदमी का बह रहा है कई घरों में राग
उस आदमी का जिस तरह बहती नदी है जेठ में।
 
-----------    विनोद (डा.रामेशवर  द्विवेदी)