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Thursday, 4 June 2015

दुःख



आप मरे हुए लोग हैं
या अधूरे आदमी
क्योंकि नहीं जानते दुःख।
आपके पास न होंगे .
पर बहुत है दुःख दुनिया में
हर कोंपल के पहले
पेड़ की जड़ों में बजता है दुःख
टूटते हुए पत्तों का।
वह जागता है .
सूखती नदी की झुर्रियों में
नहीं देख सकते घ्

दोहरी दोपहर



दोपहर लौटती है
अंगुली थामे स्कूल से दुकेली
थमा जाती है चाचा चौधरी
विक्रम.बैताल के किस्से
किसलयी हाथों को रेषमी कलम
फाइव स्टार टॉफी
रंगीन खिलौने.बसए ट्रेनए वायुयानए बंदूकें
खौलते मौसम से अजाना
परियों के पंख पर
चाँदनी के देष घूमता है ऐष्वर्य !

दीपावली




दीप ?
तुलसी चौड़ा पर
अर्ध्य-औधा पात्र उठाते
प्रतीक्षिता की दो खुली अँाखें
हरी पत्तियों पर चमकती
ओस बूँद
जमीन पर सितारो का उतरना
नव धनाढ़्या के अगराए वैभव की आग
हथियार के आकार में ढ़ले खिलौने
बारूद का खतरनाक खेल
द्रौपदी का दांव पर चढ़ना
नषे की बेहोष रात
उल्लू का बोलना
लक्ष्मी आज फिर पूछेगी -
कौन जाग रहा है
यहाँ कौन जाग रहा है ?

दिवा-स्वप्न




बूढे़ दरख्त ने देखा
दिवा-स्वप्न
सूखी षाखें भर गईं
कलोंजर और किसलयों से
नख षिखान्त

दिन भर फूला रहा

चूडि़यो में सपने जीती



1)
नहीं व्याही जाती अकेले मर्द से
यहां पूरे परिवार से
व्याही जाती हैं औरते,
कितनी भी तेज
कितनी भी सुंदर
अक्सर - एक समान होती जाती हैं औरते

बीते बर्श! बधाई



कि लील लिए तुमने
फिर कितने हरभजन, सफदर और पाष
जिन्हें जीने की बड़ी चाह थी
कि जो गले-गले तक डूब कर
जिन्दगी को जीना चाहते थे
बचे रहे हम
मरे नहीं आकाल-मौत
भरी रहीं बैलों की नादें
परोसा जाता रहा सानी-पानी
चरते रहे गदहे
पसीनों की फसलें
उठता रहा छप्परों पर जहरीला धुँआ

हर सुबह-षाम 

बीसवीं सदी की डबडबायी आँख



1)
बेटिकन के पोप की प्रिय पुत्री भर नहीं !
बीसवीं सदी की डबडबायी आँख
राहत-सी
उपेक्षितों की मँा
कभी नहीं मरती

होती है अंधेरे में धु्रव तारा
स्मित अधरो के प्रभा मंडल तक
उतरती हुई सफेद कबूतरों के झुंड के झुंड
पसीजती पलकों की कोरों पर ही
कम कर जाती है
करोड़ों षरणार्थी षिविरों की करुणा
लियोनार्डो-दा-विंचि की कल्पना को

आकार देती है

बेंजामिन मोलाइस के लिए




बन्धु !
तुम्हारा जन्म सार्थक
समय की बहती नदी में
द्वीप-सी उभरी तारीख
तुम्हारी पहचान।
बर्बरता के नकार का नाम
बेंजामिन।
जुल्म के सीने पर
संघर्श-मूल्यों के निषान का नाम
बेंजामिन।

बसंत और बारिष




1)
सारी दुनिया में चलती थी उजाड़ आँधी
उड़ती थी रेत
उठता था बवंडर
माँ की आखों में
बादल उतर आते थे
काली घटाओं में चमकती थी बिजली

2)
पतझड़ में जब भी टूटते थे पीले पत्ते
फूल, माँ से मांगते थे मुस्कुराना
नंगी डालियों पर कोंपल
बज्जड़ तनों पर किसलय-सी
फूट पड़ती थी माँ।

बंजर सदी के अंत में




जब सिनेमा से चालित हो समाज
टी.वी. से चिपके हों
चेहरे और आँख
चकोड़ा चैनलों से उतरकर
हर घर-आंगन में पसर रहे हों
खूबसूरत खतरे
जब पुराने हो गए हो
संस्कार और षास्त्र
रद्दी की जगह जला लिए गए हो
षील और सिद्धांत  

बच्चा





बच्चों !
तुम नहीं हो सिर्फ पुत्र-पुत्री
पौत्र-भाई-बहन जैसा एक रिष्ता 
किसी व्यक्ति के लिए
एक सपना हो तुम
माँ की ऑखों में
कच्चे दूध की हर घूंट के साथ 
समाज के लिए आकार लेते हुए
सार्थक सपना हो
तुम मुस्कुराते हो तो
दस्तक देता है बसंत  

आकाष हमें भी चढ़ना है



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आकाष हमें भी चढ़ना है



सिर्फ पढ़े हैं
चांदनी की सफेद चादर पर
कुमकुम के कुंआरे गीत
दूर क्षितिज की ओर
रूपहले पनघट पर
पनिहारिनों की धुंधली परछाइयां
मेंहदी के जंगल में
पायल की रुनझुन
इंन्द्रधनुश का गुनगुन स्वर
गंधित पुरवाई में
मौंसम का गाया कोई फागुनी राग

मगर कभी भी
” न बोलते हुए फूलों को सुना है  
न झमकती हुई ध्वनियों को देखा है ”
देखे हैं गहरी धंसी हुई
कांच की गोलियों-सी
बाइस बर्शीय आँखे
बेइमानो से काट ली जाने वाली
अधपकी फसलें
बारह बर्शीय बुजूर्गों का
पसीनें में महकता व्यापार
या फूलती साँस के सामान्य होने पर
याद आने वाला प्यार

आयेगी कविता



कविता नही आती महीनों
तो मतलब नहीं कि
लापरवाह हो रहे है सपनें
मतलब यह कि आकाष
खाली है परिन्दों से इन दिनों।

कविता आयेगी, - जब उजड़ जाने पर
ढ़ीठ होकर चिडि़याँ
घर के किसी साफ-षफ्फाक कोने में
फिर बनायेगी घोंसला

जब कोई मरेगा कहीं
षब्दहीन अकेले


---Continue

आस्था



पौेधे पत्थर हो जाऐंगे
सूरज को भी आने लगेगी नींद
जात बदल जाएगी मेंहदी की
गुलाब में बच जाऐगे सिर्फ काँटे
भाग कर छिप जाऐगे लोग घरों में
जब भी कोई अजनबी
किसी चौक पर अकबका कर पूछेगा
खोया हुआ किसी का पता
दोस्त !

-----continues

Saturday, 11 February 2012

एक परिचयः मेरे बाद (पंडित श्री योगेन्द्र द्विवेदी) (1923 - 28 फरबरी, 2011))

भूमि पर मुझको लिटाना
जब कभी तो इस तरह कि
पीठ पर आकाश……..
मेरे होंठ मिट्टी से जुडे हों
लोग पूछें तो बता देना
सिर्फ देना जानता था
बसेगी वहीं मूर्ति इस जमीन में
हाथ दो पारस थे जिसके
मिट्टी को कंचन बनाना चाहता था
जन्म से ही धर्म जीता था मनुज का
लोग पूछें तो बता देना
किसी से कुछ माँगा
लोग पूछें तो बता देना यहाँ पर
नींद में घायल सिपाही सो गया है
जो उडाने का बडा शौकीन था उजले कबूतर
और झडता था महज आशीष मंगल
लौह तलहथियाँ से जिनके
सदानीरा नदी कोई बह रही थी
नाडियों में स्वयं के भीतर नसों में
नाचती थी वर्ष नब्बे तक
कुछ पसीने कुछ क्षमा
कुछ अनसुनेपन की नदी
के साथ बहता था नशा बस जिन्दगी का
राग छलछल नेह छलछल
छोह और निर्मोह छलछल
अब नहीं है वह नदी
सरस्वती कोई हुई है फिर अलोपित
या समंदर हो गई है बूंद कोई
अब बसा है एक भोला सा
वही विज्ञानी यहाँ पर जिंदगी का
वाड्ग्मय संस्कृत का पीआ था जिसने
लोग आगत जानने आते रहे थे पास
साख ना तोडी कभी ना झूठ बोला
कबीरा चादर का कभी ना साथ छोडा
ऐसे कई असंभव साधता था जिन्दगी भर 
चाँद छूने की कला भायी जिसको
एक सहारा रेत में बरगद खडा था
चुप अकेला पँक्षियों की ओढकर चादर हरा था
हर महीना वह भरा था
इक घडे सा अर्घ्य था
अभिषेक का जीवन सफर में
रामनामी को पिरो रूद्राक्ष में
पदरज उढाए मुठ्ठियों में
पत्थरों में प्राण का जादू जगाना चाहता था।
हर उपेक्षित आदमी का वह सगा था
लडकियों कि जिंदगी सजती जहाँ थी
उस जमीं पर वह अकेला ही सभा था उम्र भर
आगन्तुकों को बाटताँ था थाल अपनी
हो गया आकाश निस्सीम आयतन है
बस कोई बहती नदी थी
जिसने गोमुख को देखा
पहचाना पूर्वज पर्वतों को
सारे गोमुख गंगा पर्वतों को
है हमारा नमन शत् शत्
नमन शत् शत्
अनथकी इस नदी के राग को
गा रही है कई घरों में आग
उस आदमी का बह रहा है कई घरों में राग
उस आदमी का जिस तरह बहती नदी है जेठ में।
 
-----------    विनोद (डा.रामेशवर  द्विवेदी)