Wednesday, 1 November 2023

झूठ बोलूंगा इस बार: रामेश्वर द्विवेदी


झूठ बोलूंगा इस बार

■ रामेश्वर द्विवेदी

कैसा है मेरा घर?
पड़ोसी!
तुम्हारी तबीयत कैसी है?

तीस वर्ष पैदल चलती
कल रात वह औरत
मेरे सपने में आयी थी
वह वैसी ही थी जैसी दिखती थी पहले
पति के बारे में नहीं पूछा
कि क्या वह अब भी पीता है शराब?
कि अब किस पर फेंकता है थालियाँ
खाने में कभी नमक भूल जाने या
ज़रा-सी मिर्ची के चढ़ जाने के बाद
ज़मींदोज़ होती कटोरियों के बजने के बारे में
वह नहीं थी फिक्रमंद

उसने दुआएं दी और विरक्त दिखी
और कुछ भी नहीं पूछा
कि लोग राई भर भी अच्छे हुए हैं
कि तिल-तिल कर बढ़ी है बुराईयाँ
वह चुप रही
उसके पास शुभकामनाओं की थैली
उद्बोधनों से भरी अंजुली के अलावा
चिंता की रेखाओं का जाल था
वह खाली थी।

Monday, 26 June 2023

कहानी: कैसे

कहानी: कैसे 

__रामेश्वर द्विवेदी 

जीत नाम था उसका। पिता पंजाबी के प्राध्यापक रहे थे। शुचिता उसे विरासत में मिली थी। अब याद नहीं कि उसने पूरे नाम में 'जी' के पहले 'सर्व' या 'दल' या 'दिल' था परंतु मुझे उसका व्यक्तित्व पूरा, पर नाम आधा ही पसंद था । जब फोन मे पहली बार मे मैंने उसे जीत पुकारा वह चौंक गया था -

"सर जी ! मेरे पाजी से बात हुई क्या ? नंबर दिया था न मैंने, वे मुझे जीत ही बुलाते हैं। "

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बाकी के लिए : अकार : https://notnul.com/Pages/Book-Details.aspx?Shortcode=CLRWSZ8Q